सोमवार, 15 मार्च 2021

निजीकरण के विरुद्ध आवाज

जागरूकता हेतु एक प्रयास

एक मां थी और सौ करोड़ बेटे थे। मां ने अपने एक बेटे बेचू दास को घर संभालने की जिम्मेवारी सौंपी थी। वह रात-दिन काम कर रहा था कि घर का विकास हो। घर में आठ-दस भैंसे थीं, मुर्गियां थीं, खेत थे और एक तालाब था। बेटे ने आकर एक दिन मां को कहा-

मां, मैं सोच रहा हूं कि मुर्गिंयों को ठेके (कॉन्ट्रेक्ट) पर दे दूं।’’*

-’’ क्यों ?’’

*" मुर्गियां जितने का दाना खा रही हैं उससे कम के अंडे दे रही हैं। इनको रखने से हमें नुकसान हो रहा है।’’*

-’’ लेकिन बेटा, उनके दाने की मात्रा बढ़ाकर हम और अंडे नहीं ले सकते ?’’

 बेटा झल्ला गया। उसने चिढ़कर कहा-

*"’ मां, मैने भूल्लन बाबू से बात कर ली है। वे मुर्गियां ठेके पर ले जायेंगे और उसके बदले में हमें रोज अंडे दे दिया करेंगें।’’*

मां चुप हो गई। बुढ़िया की कौन सुनता। उसने सोचा कि बाकी बेटे बोलेंगे लेकिन सब के सब चुप थे। 
बेचू ने मुर्गियां कॉनट्रैक्ट (ठेके) पर दे दीं और दिन-रात मेहनत करने लगा। न खाने का ठिकाना न पहनने का। समय बीते वह एक दिन उत्साह से लबालब अपनी मां के पास आया-और बोला
*’’ मां, मैं सोच रहा हूं कि तालाब को कॉन्ट्रेक्ट पर दे दूं।’’*

-’’ क्यों ? ’’ मां दुःखी होकर बोली।

*" देखो, मछली का जीरा डालना, उनकी रक्षा करना कितना बेकार का काम है जबकि भूल्लन सेठ तालाब के बदले हमें मछलियां देने को तैयार है। बिना किसी झंझट के ही मछलियां मिल जाया करेंगी मेने तालाव को कॉन्ट्रेक्ट (ठेके) पर दे दिया है।’’*

-’’ लेकिन बेटा.................।’’
 बेचूदास नाराज हो गया। 

*’’ मां, मैें जो कर रहा हूं सोच-समझकर ही कर रहा हूं।’’*

तालाब भी हाथ से चला गया। मछलियां आने लगीं। बेचूदास खुशी में झूमता रहता था। उसको पक्का यकीन हो गया था कि उसके पूर्वज मूर्ख थे जो मछलियों के लिए तालाब और अंडों के लिए मुर्गियां रखते थे। वह अपनी अक्लमंदी पर इतराता रहता था। फोकट की मछलियां खाकर उसका गुण गाने वाले उसके यार-दोस्त उसकी खूब प्रशंसा करते रहते ।

थोड़े समय के बाद वह मारे खुशी के झूमता हुआ माँ के पास आया-
*’’ मां, भैंसों का भी ठेकेदार मिल गया है कॉन्ट्रेक्ट पर।’’*

-’’ क्या अब भैंसे भी हाथ से निकलजायेंगी?’’

*’’ अरे मां, तुम कितनी भोली हो। भैंसे कितना चारा खाती है। साथ ही एक चरवाहा भी रखना पड़ता है। उसका खाना-कपड़ा अलग। बिना किसी तूल-बखेड़े के ही दूध देने को भूल्लन सेठ तैयार है कॉन्ट्रेक्ट पर।’’*

मां जानती थी कि बोलने पर चिल्लायेगा तो चुप ही रही। उसने सोचा कि बाकी भाई बोलेंगे लेकिन सब अपने-अपने कपड़ों की चमक में खोये हुये थे। बेचूदास ने सबको अलग-अलग नाप के कपड़े बनवा दिये थे। सबको यह भरोसा दिला दिया था कि उसके कपड़े तो नाप के हैं दूसरों के नहीं। सब एक दूसरे का मजाक उड़ाने में व्यस्त थे। 

बेचूदास एक दिन खूब मगन होकर अपनी वीरता के गीत गा रहा था। मां ने पूछा -

-’’ अब क्या बेचकर आ गया ?’’

*’’ मां बेचा नहीं, अनाज की नई व्यस्था कर दी।कॉन्ट्रेक्ट पर खेत भूल्लन संभालेगा। हमें अनाज दे दिया करेगा। खेत उसके अनाज हमारे। ’’*
मां ने सिर पीट लिया। वह चिल्लाती तो बेचूदास के दोस्त उसका मजाक उड़ाते थे। 

और एक दिन वह भी आया जब बेचूदास ने आकर मां को हंसते हुये कहा-
*’’ मां, सामान बांध लो हम शहर में रहने जा रहे हैं।’’*

-’’ क्यों ?’’

*’’ मां, मैने यह घर बेच दिया है और बदले में भूल्लन सेठ हमें शहर में एक फ्लैट दे रहा है। बिल्कुल मुफ्त, मां , गांव की गंदगी से निकलने का समय आ गया है।’’*

मां रोई-चिल्लाई लेकिन बेचूदास ने एक न सुनी।

*शहर में आने के बाद,भूल्लन सेठ का कॉन्ट्रेक्ट ख़त्म हो गया पहले अंडे आने बंद हुये, फिर तालाब सूख गया। दूध देने से भूल्लन सेठ ने साफ मना कर दिया सभी भाई परेसान होने लगे।*

और , एक दिन वह भी आया जब भूल्लन सेठ भाग गया।

 बेचूदास झोला उठाकर चला गया। 

*मां और उसके सौ करोड़ बेटे आज भी बैठे बैठे रो रहै है*

*ये मां हम सबकी भारत माता है और इसकी रक्षा करने के लिये सदियों से भारत माता के सपूत कुर्बानी देते आए हैं । आज आप नहीं जागे तो इतिहास में दफन आपकी हड्डियों को खोदकर आने वाली पीढियां कहेंगी कि ये उन देशद्रोहियों की हड्डियां हैं जिन्होंने पूंजीवादी ताकतों का प्रतिरोध करने का साहस नहीं किया ...*

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   *समझ में आए तो*
         *निजीकरण से देश बचाओ।*
   
    जय हिन्द,
       जय भारत।

    🙏🙏🙏🙏

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